विरह-माधुरी · पद 79
कहा सखि! कबहुँ न अइहैं श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahā sakhi! kabahuṁ na aihaiṁ shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहा सखि! कबहुँ न अइहैं श्याम।
2बनिहैं कहा निठुर पिय एतिक, सरल सुखद सुखधाम।
3कहा सुरति रति-रसहूँ, की सखि!, बिसरैहैं वसुयाम।
4कहा भूलि जैहैं प्रिय मनसुख, धनसुख, अरु श्रीदाम।
5कहा भुलैहैं नंद-यशोमति, अस परतीति न भाम!।
6कहा “कृपालु” सुरति बिसरैहैं, प्रानन प्रिय ब्रजधाम॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर के वियोग में वियोगिनी ब्रजांगनाओं अरी सखि! क्या श्यामसुन्दर कभी नहीं आवेगे? क्या इतने सरल स्वभाव-वाले इतने कठोर बन जावेंगे? अरी सखि! क्या विलास को सुधि भी भूल जावेंगे? क्या धनसुख, मनसुख एवं श्रीदामादिक का प्यार भी भुला देगें? और क्या नन्द-यशोदा के वात्सल्य प्रेम को भी भूल जायेंगे? ऐसा तो नहीं हो सकता। कृपालु' कहते हैं-क्या प्राण से भी अधिक प्रिय ब्रजधाम की सुधि भी भुला देंगे? नहीं! नहीं। ऐसा नहीं हो सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 772