विरह-माधुरी · पद 78
कहत हरि, सुनु सब ब्रज बनितान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahata hari, sunu saba brajabanitāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहत हरि, सुनु सब ब्रज बनितान।
2हम जानत हम ब्रज-गोपिन को, प्राननहूँ को प्रान।
3हमरोहु प्रानन-प्रान तुमहिं सब, यह तुमहूँ भल जान।
4हौं लीनो अवतार जान तुम, करन विश्व-कल्यान।
5प्रियतम की रुचि महँ रुचि राखे, सोई"प्रेम"बखान।
6है “कृपालु” असि-धार धावनो, करनो प्रेम समान॥
हिन्दी भावार्थ
(गोपियों के करुण-क्रन्दन पर श्यामसुन्दर का प्रत्युत्तर) अरी ब्रजांगनाओं! सब लोग ध्यान देकर सुनो! हम भली भाँति जानते हैं कि हम ब्रजांगनाओं के प्राणों के भी प्राण हैं और तुम लोग भी भली-भाँति जानती हो कि तुम लोग भी हमारे प्राण की प्राण हो किन्तु तुम लोग यह भी जानती हो कि मैंने विश्व कल्याण के लिए अवतार लिया है। इसके अतिरिक्त प्रेम का वास्तविक स्वरूप यही है कि प्रियतम की इच्छा में निज इच्छा रखी जाय। 'कृपालु' कहते हैं कि तलवार की धार पर दौड्ना एवं प्रेम करना दोनों एक समान ही हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 771