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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 77

करी का, ना जाने वाने।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: karī kā, nā jāne vāne

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1करी का, ना जाने वाने।

2नहिं माने अनजाने नैनन, नैनन उरझाने।

3अब सोइ मन-मोहिनि सोहिनि छवि, लखन हठन ठाने।

4कहा कहूँ वा चितवनि महँ का, जादू ना जाने।

5बरबस लियो सखी! सरबस उन, नैनन अलसाने।

6अब “कृपालु” का होइहैं आगे, सुनत सखिन ताने॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! उस नटखट ने मेरे ऊपर न जाने क्या रोना कर दिया है। मेरे भोले- भाले नेत्र हठ के कारण एक दिन उनके नेत्रों से उलझ गये और अब मनमोहन की उसी मोहिनी छवि को देखने के लिए बार-बार दुराग्रह करते हैं। अरी सखि! क्या बताऊँ पता नहीं उनकी चितवनि में क्या जादू था जो उनके अलसाने नैनों को देखते ही र मैं अपना सर्वस्व खो बैठी। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है-यह तो प्रारम्भिक अवस्था है- अभी से सखियों के व्यंग्य सुनने पड़ते हैं, भविष्य में जाने क्या होगा?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 770-771