विरह-माधुरी · पद 76
करहु जनि, कारेन की कछु बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: karahu jani, kārena kī kachhu bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1करहु जनि, कारेन की कछु बात।
2तन मन, प्रान समर्पन करि के, जोर्यों हरि सों नात।
3सो ठुकराय, गये तजि मथुरा, हम तलफति दिनरात।
4कंस मारि राजा बनि बैठे, हम सब सों किय घात।
5हम वरदान माँग विधि सों मोहिं, करियो कूबरि गात।
6कह “कृपालु” कारेन की बातन, सपनेहुँ तजि न सकात॥
हिन्दी भावार्थ
र एक ब्रजांगना श्यामसुन्दर के वियोग में अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखि! कालों की बात न कर। जिस काले श्यामसुन्दर से, अपना सर्वस्व समर्पण करके हम लोगों ने नाता जोड़ा उसने हम लोगों को ठुकरा दिया और मथुरा चला गया। हम दिन-रात तड़प रहे हैं। मथुरा में जाकर कंस को मारकर वह राजा बन बैठा है। उसने हम लोगों के साथ महान् विश्वासघात किया है। हम तो ब्रह्मा से यही वरदान मागते हैं कि अगले जन्म में हमको कूबरि बना देना, जिससे श्यामसुन्दर मेरा परित्याग न करें। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! तू कुछ भी कह किन्तु मैं जानती हूँ कि तू काले श्यामसुन्दर को चर्चा को स्वप्न में भी नहीं छोड़ सकती।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 769-770