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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 75

कबहुँ जनि, कारेन कोउ पतियाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kabahuṁ jani, kārena kou patiyāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कबहुँ जनि, कारेन कोउ पतियाय।

2त्रेता भये राम सखि कारे, जेहि भगवान बताय।

3बालिहिं बध्यो व्याध जनु छुपि के, वालमीकि अस गाय।

4सती शिरोमणि सीतहिं त्याग्यो, विपिन अकेली हाय।

5कहत पुरान भये इक वामन, सोउ भगवान कहाय।

6तन, मन, प्रान दान दीनेहुँ बलि, बाँधि पताल पठाय।

7इक कारे मुरली वारे जेहि, श्रुति भगवान सुनाय।

8तन मन प्रान लूटि हम सब कहँ, योग विराग सिखाय।

9इन “कृपालु” कारे भगवानहिं, मोहिं भगवान बचाय॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर के वियोग में एक जली-भुनी विरहिणी अपनी सखी से कहती है कि अरी सखि! काले रंग वालों का कोई विश्वास न करे। वे चाहे भगवान् ही क्यों न हों। तरेता में काले रंग के राम हुए हैं, जिन्हें लोग भगवान् कहते हैं। वाल्मीकि के कथनानुसार उन्होंने बाली को व्याध की भाँति छिपकर मारा एवं हाय सखि! सती शिरोमणि सीता सरीखी स्त्री को जंगल में अकेली छोड़ दिया। पुराणों के कथनानुसार काले रंग के एक वामन भगवान् हुए हैं जिनको बलि ने अपना तन, मन प्राण सर्वस्व दान कर दिया फिर भी उन्होंने उसको बौधकर पाताल भेज दिया। श्रुतियों के कथनानुसार काले रंग के एक श्यामसुन्दर भी कहे जाते हैं जिन्होंने हमारा सर्वस्व लूटकर हमें योग वैराग्य सिखाने के लिए उद्धव को भेजा है। 'कृपालु' कहते हैं कि इन काले रंग के भगवानों से हमको भगवान् बचाये।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 768-769