विरह-माधुरी · पद 74
ओझाई करि ओझा गये हार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ojhāī kari ojhā gaye hāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ओझाई करि ओझा गये हार।
2ओझाराम! समुझ तव थोरी, अति मति-मंद गमार।
3लगत जाहि नँदपूत झरत नहिं, भूत सकत तुम झार।
4जानत नहिं कछु बात प्रीति की, लक्षण दोउ इकसार।
5स्तंभ, स्वेद, रोमांच, कंप दोउ, दोउ मदमत्त अपार।
6रुदत, हँसत, नाचत, गावत दोउ, दोउ सुधि-देह बिसार।
7पै “कृपालु” इक लेत प्राण, इक, देत प्राण बलिहार॥
हिन्दी भावार्थ
र (एक विरहिणी गोपी को उसके माता-पिता की राय से ओझा लोग झाड़-फूँक करने के लिए आ गये एवं झाड्ने-फूँकने लगे। इस पर एक सखी कहती है।) ओझा लोग (भूत-प्रेत झाड़ने वाले) ओझाई करके अर्थात् झाड़-फूँक करके थक गये। सखी कहती है कि हे ओझाराम! तुम्हारी समझ थोड़ी है एवं तुम अत्यन्त ही मतिमन्द, मूर्ख हो। अरे ओझाजी! जिसके नन्दपूत लग जाता है वह झाड़ने फूँकने से नहीं छोड़ता। हाँ, जिसके भूत लगा हो उसे तुम लोग झाड़-फूँक कर निकाल सकते हो। तुम्हें किंचित् भी प्रीति की बात का पता नहीं है। इन दोनों के ही लक्षण एक से होते हैं। दोनों के ही शरीर में स्तम्भ, स्वेद, रोमांच एवं कम्प होता है तथा दोनों ही मतवाले रहते हैं। ये दोनों ही कभी रोते हैं, कभी हँसते हैं, कभी नाचते हैं, कभी गाते हैं तथा दोनों ही अपने देह को सुधि-बुधि भूले रहते हैं। कृपालु' कहते हैं कि इन सब लक्षणों के मिलते हुए भी इन दोनों में एक बहुत बड़ा अन्तर है, वह यह कि भूत लग कर प्राण ले लेता है एवं नन्दपूत लग कर उसे अपना प्राण तक देकर बलि-बलि जाता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 767-768