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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 73

ऊधो!, ह्वै गये प्रेम अधीर।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho hvai gaye prema adhīra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, ह्वै गये प्रेम अधीर।

2बूड्यो ज्ञान प्रेम-अंबुधि महँ, धरत न कैसेहुँ धीर।

3धरि धरि लतन तरुन भरि भेंटत, झरझर बरसत नीर।

4हा प्राणेश्वर! प्राणनाथ कहि, विलपत कुंज कुटीर।

5ग्रह गृहीत जनु नाचत गावत, सुधि बुधि नाहिं शरीर।

6जयतु “कृपालु” प्रेम गोपीजन, जिन ज्ञानिहुँ दइ पीर॥

हिन्दी भावार्थ

गोपांगनाओं के द्वारा प्रेम-दान प्राप्त करके उद्धव प्रेम विभोर हो गये। उनका ज्ञान प्रेम के समुद्र में डूब गया। वे अधीर हो गये। लताओं एवं वृक्षों को पकड़-पकड़ कर भेंटते हुए आँखों से प्रेमाश्रु बरसाने लगे। हा प्राणेश्वर! हा प्राणनाथ! ऐसा कह कर कुञ्ज गृहों में विलाप करने लगे। उद्धवजी भूत लगे हुए के समान कभी नाचते हैं, कभी गाते हैं। उनको अपने शरीर की भी सुधि न रही। 'कृपालु' कहते हैं कि उस गोपी प्रेम पर मैं बलिहार जाता हूँ, जिसने ज्ञानियों के हृदय में भी विरह वेदना उत्पन्न कर दी।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 767