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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 72

ऊधो!, हैं माधो ठगहार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, haiṁ mādho ṭhagahāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, हैं माधो ठगहार।

2तुम कहँ पठयो ज्ञान देन कहँ, यह श्लेषालंकार।

3याको भाव इहै दै ज्ञानहिं, लेहु प्रेम उपहार।

4परम विनोदी सखा तुम्हारे, सदा वक्र गति धार।

5तुमहिं बिचारे भोरे भारे, उन कहँ मिल्यो गमार।

6तदपि “कृपालु” न टोटो ऊधो!, माधो के व्यापार॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रज-ललनाएँ अद्ठैती उद्भव से कहती हैं कि हे उद्धव! तुम्हारे सखा माधव नम्बरी ठगहार हैं। तुमको ज्ञान देने के लिए भेजा है इसमें श्लेषालंकार है (एक शब्द के अनेक अर्थ होना श्लेष अलंकार होता है) इसका वास्तविक भाव यह है कि तुम अपना ज्ञान हमको सदा के लिए दे जाओ और उसके बदले में हमसे प्रेम की भेंट ले जाओ। तुम्हारे सखा बड़े ही लीलाधारी हैं। वे सदा ही टेढ़ी चाल से चलते हैं। उनको तुम सरीखे भोले-भाले मिल जायँ तो उन्हें इसी प्रकार बुद्धू बनाते जायँ। इतने में ही 'कृपालु' ने कहा कि हे उद्धव! फिर भी तुम्हारे सखा तुम्हारे हितैषी हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 766-767