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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 71

ऊधो!, हैं माधो करतार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, haiṁ mādho karatāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, हैं माधो करतार।

2वे जो करहिं उनहिं सब छाजत, हैं समरथ भरतार।

3श्रीपति कहँ श्रीयुत दिय शेषहिं, शय्या सिंधु मझार।

4शिव शंकर को दिय बाघंबर, जो दे मुक्ति हुँ चार।

5मातु यशोमति तृण सम त्यागी, हृदय पूतना धार।

6उनकी गति “कृपालु” वे जानें, कछु जानति ब्रजनार॥

हिन्दी भावार्थ

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि श्यामसुन्दर भगवान हैं, सर्वसमर्थ हैं। वे जो कुछ भी करते हैं वह उनके लिये शोभनीय ही है। देखो उद्धव! सम्पूर्ण ब्रह्मांड के पालन करने वाले विष्णु को लक्ष्मी के सहित समुद्र में शेषनाग की शैया दे रखी है, उन बिचारों के पास टूटी खाट भी नहीं है एवं चार प्रकार की मुक्ति देने वाले सृष्टि-प्रलयकर्ता भगवान शंकर को पहनने के लिए बाघम्बर दे रखा है। कहाँ तक कहें जिन्होंने के लिए बाघम्बर दे रखा है। कहाँ तक कहें जिन्होंने यशोदा सरीखी मैया को तुण के समान छोड़ कर पूतना राक्षसी को हृदय में धारण कर रखा है, उनकी गति को वे ही जानें। कृपालु' कहते हैं कि कुछ-कुछ ब्रजांगनाएँ भी जानती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 765-766