# ऊधो!, हैं माधो करतार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0822-M19-K071
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 71
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 384–384

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, हैं माधो करतार।  
<a id="line-2"></a>वे जो करहिं उनहिं सब छाजत, हैं समरथ भरतार।  
<a id="line-3"></a>श्रीपति कहँ श्रीयुत दिय शेषहिं, शय्या सिंधु मझार।  
<a id="line-4"></a>शिव शंकर को दिय बाघंबर, जो दे मुक्ति हुँ चार।  
<a id="line-5"></a>मातु यशोमति तृण सम त्यागी, हृदय पूतना धार।  
<a id="line-6"></a>उनकी गति “कृपालु” वे जानें, कछु जानति ब्रजनार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि श्यामसुन्दर भगवान हैं, सर्वसमर्थ हैं। वे जो कुछ भी करते हैं वह उनके लिये शोभनीय ही है। देखो उद्धव! सम्पूर्ण ब्रह्मांड के पालन करने वाले विष्णु को लक्ष्मी के सहित समुद्र में शेषनाग की शैया दे रखी है, उन बिचारों के पास टूटी खाट भी नहीं है एवं चार प्रकार की मुक्ति देने वाले सृष्टि-प्रलयकर्ता भगवान शंकर को पहनने के लिए बाघम्बर दे रखा है। कहाँ तक कहें जिन्होंने के लिए बाघम्बर दे रखा है। कहाँ तक कहें जिन्होंने यशोदा सरीखी मैया को तुण के समान छोड़ कर पूतना राक्षसी को हृदय में धारण कर रखा है, उनकी गति को वे ही जानें। कृपालु' कहते हैं कि कुछ-कुछ ब्रजांगनाएँ भी जानती हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 765-766

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
