# ऊधो!, हैं माधो ठगहार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0823-M19-K072
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 72
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 384–384

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, हैं माधो ठगहार।  
<a id="line-2"></a>तुम कहँ पठयो ज्ञान देन कहँ, यह श्लेषालंकार।  
<a id="line-3"></a>याको भाव इहै दै ज्ञानहिं, लेहु प्रेम उपहार।  
<a id="line-4"></a>परम विनोदी सखा तुम्हारे, सदा वक्र गति धार।  
<a id="line-5"></a>तुमहिं बिचारे भोरे भारे, उन कहँ मिल्यो गमार।  
<a id="line-6"></a>तदपि “कृपालु” न टोटो ऊधो!, माधो के व्यापार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ब्रज-ललनाएँ अद्ठैती उद्भव से कहती हैं कि हे उद्धव! तुम्हारे सखा माधव नम्बरी ठगहार हैं। तुमको ज्ञान देने के लिए भेजा है इसमें श्लेषालंकार है (एक शब्द के अनेक अर्थ होना श्लेष अलंकार होता है) इसका वास्तविक भाव यह है कि तुम अपना ज्ञान हमको सदा के लिए दे जाओ और उसके बदले में हमसे प्रेम की भेंट ले जाओ। तुम्हारे सखा बड़े ही लीलाधारी हैं। वे सदा ही टेढ़ी चाल से चलते हैं। उनको तुम सरीखे भोले-भाले मिल जायँ तो उन्हें इसी प्रकार बुद्धू बनाते जायँ। इतने में ही 'कृपालु' ने कहा कि हे उद्धव! फिर भी तुम्हारे सखा तुम्हारे हितैषी हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 766-767

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
