# किशोरी पद किंकर श्याम सुजान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0835-M19-K084
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 84
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 389–390

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>किशोरी पद किंकर श्याम सुजान।  
<a id="line-2"></a>नवल-निकुंज-मंजु बिच नित ही, चापत चरनन कान्ह।  
<a id="line-3"></a>कबहुँक चँवर ढुरावत कबहुँक, खड़ो लिये पिकदान।  
<a id="line-4"></a>बरसाने की गलियन बिच नित, करत लली-गुनगान।  
<a id="line-5"></a>माँगत कृपा किशोरी जू की, करि करि सुयश बखान।  
<a id="line-6"></a>दृग अँसुवन सों चरण पखारत, जब राधे कर मान।  
<a id="line-7"></a>हा हा! खात सखिन सों याचत, राधे दर्शन दान।  
<a id="line-8"></a>गहवर गलिन रटत नित"राधे!", बिंधे, प्रिया-दृग-बान।  
<a id="line-9"></a>बड़भागी “कृपालु” सो पिवु जो, राधे हाथ बिकान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्री श्यामसुन्दर किशोरी जी के युगल चरण कमलों के सनातन दास हैं। सदा ही मनोहर नूतन निकुँजों के बीच किशोरी जी के चरणों को दबाया करते हैं। कभी तो श्यामसुन्दर किशोरी जी की चँवर डुलाते हैं, कभी पीकदान लिये खड़े रहते हैं। बरसाने की, गलियों में किशोरी जी के गुणों को गाते हुए फिरा करते हैं एवं किशोरी जी के यश का बखान करते हुए उनसे कृपा की भीख मांगते हैं। जब किशोरी जी मान करती हैं तब श्यामसुन्दर उनके चरणों में आँसू बहाते हुए मनाते हैं। किशोरी जी के वियोग में उनके दर्शनार्थ उनकी दासियों की हा! हा! खाते हैं। गह्वरवन की वीथियों में किशोरी जी के कटाक्षों से घायल हुए राधे! राधे! पुकारा करते हैं। कृपालु' कहते हैं कि वे श्यामसुन्दर बड़े भाग्यशाली हैं जो हमारी स्वामिनी जी की दासता करते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 776-777

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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