# क्रूर!, तू कत अक्रूर कहाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0840-M19-K089
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 89
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 392–392

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>क्रूर!, तू कत अक्रूर कहाय।  
<a id="line-2"></a>कुलिश करोर कठोर तोर हिय, कहु केहि धातु बनाय।  
<a id="line-3"></a>धनि धनि अवनि जननि उन जिन तोहिं, जाय माय पद पाय।  
<a id="line-4"></a>सखियन गति अँखियनहूँ देखत, हा! कत नहिं पतियाय।  
<a id="line-5"></a>लै ले प्राण प्राणप्रिय दै दे, प्राण हाय! अब जाय।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” बहुब्रीहि समासहिं, क्रूर न जासों पाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(मथुरा गमन के समय अक्रूर के प्रति ब्रजांगनाओं की उक्ति।) अरे क्रूर! तेरा नाम अक्रूर कैसे पड़ गया? करोड़ों वज्र के समान तेरा कठोर हृदय किस धातु से बनाया गया है? उस पृथ्वी एवं उस तेरी माता को क्या कहूँ, जिसने तुझे पैदा करके माता के पद को लज्जित किया है। तू अपनी आँखों से भी सखियों की दयनीय दशा देखकर विश्वास नहीं करता। हम लोगों का प्राण ले ले, किन्तु हमारे प्राण श्यामसुन्दर को न ले जा। हम लोगों का प्राण कथमपि नहीं रह सकता। इतने में 'कृपालु' ने कहा-अरी ब्रजांगनाओं! 'अक्रूर' शब्द में बहुब्रीहि समास है जिसका अर्थ है जिनके समान विश्व में कोई भी क्रूर न हो। अतएव उसका क्रूर व्यवहार स्वाभाविक ही है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 780-781

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
