विरह-माधुरी · पद 65
ऊधो!, हम पूछति इक बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, hama pūchhati ika bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, हम पूछति इक बात।
2तुम तो कहत जगत मिथ्या यह, सुनि अचरज दरसात।
3व्यापक ब्रह्म मान, पुनि जीवहुँ, ब्रह्महिं मानत जात।
4पुनि है मिथ्या तत्व कौन जो, तुम कहँ जगत लखात?।
5मिथ्याभान ज्ञान महँ कैसे?, प्रत्युत्तर दो तात।
6भये “कृपालु” निरुत्तर ऊधो, मन ही मन खिसियात॥
हिन्दी भावार्थ
गोपियाँ ज्ञानी उद्धव से कहती हैं कि हम तुमसे एक बात पूछती हैं तुम जो संसार को मिथ्या कहते हो, इसे सुनकर हमको महान् आश्चर्य होता है। में व्यापक मानते हो एवं परमाणुओं से भी सूक्ष्म जीवात्मा को ब्रह्म ही मानते हो, फिर वह कौन मिथ्या तत्व बचा जो तुम्हें संसार स्वरूप दिखाई पड़ता है? कि कोई अन्य मिथ्या तत्व है भी, तो भी ब्रह्म ज्ञान होने पर उस मिथ्या तत्व का भान कैसे रह सकता है? इसका उत्तर दो। उद्धव कुछ भी उत्तर न दे सके एवं मन ही मन अत्यन्त खिसिया गये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 761