विरह-माधुरी · पद 64
ऊधो!, हम जानति सब बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, hama jānati saba bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, हम जानति सब बात।
2वे मेरे, मैं उनकी सनातन, तुम नहिं समुझि सकात।
3जल अरु वीचि भिन्न सोइ भाखत, जाकी मति भरमात।
4विरह अगिनि विरहिनि-मन कंचन, दुति दूनी दमकात।
5तुम भोरे ज्ञानी अति कोरे, बीचहिं मारे जात।
6अटपट रीति “कृपालु” प्रीति की, जहँ विधि बुधि बौरात॥
हिन्दी भावार्थ
( श्रीकृष्ण की वियोगिनी ब्रज-गोपिकाएँ उद्धव से कहती हैं।) हे उद्धव! हम सब श्यामसुन्दर के अन्तरंग रहस्यों को भली भाँति जानती हैं। वे सदा से हमारे हैं और सदा रहेंगे एवं इसी प्रकार हम भी सनातन उनकी ही हैं किन्तु यह रहस्य तुम नहीं समझ सकते। जल एवं तरंग की भिन्नता वास्तविक रूप से उसी को भासित होती है जिसकी बुद्धि में किसी प्रकार का भ्रम आ जाता है। हमारी उनकी भी बिल्कुल इसी प्रकार एकता है। यदि तुम यह कहो कि तुम लोगों को वियोग का दुःख है तो यह भी तुम्हारा भ्रम ही है। विरह रूपी अग्नि में विरहिणी का मन रूपी स्वर्ण और भी दुगुनी चमक को प्राप्त करता है जिसे विरहिणी ही समझती है। तुम अत्यन्त ही भोले भाले एवं शुष्क वेदान्ती, व्यर्थ ही हमारे-उनके बीच में पड़कर चकरा रहे हो। 'कृपालु' कहते हैं कि अरे उद्धव! तुम नहीं समझते कि प्रीति की रीति अत्यन्त ही विचित्र होती है। जिसका बहिरंग स्वरूप देखकर ब्रह्मा की बुद्धि भी अपनी सुधि-बुधि खो बैठती है। (सख्य-लीला में श्रीकृष्ण को ग्वालों से छीन छीनकर रोटी खाते देखकर ब्रह्मा का मोह।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 760-761