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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 63

ऊधो!, हम अबला ब्रजनार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, hama abalā brajanāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, हम अबला ब्रजनार।

2जाइ कह्यो उन नँदनंदन सों, जो लबरन सरदार।

3काहू को बल काहुहिं हम कहँ, इक बल नंदकुमार।

4काहू के सुत, पति, तिय, भगिनी, नाते जगत हजार।

5हमरे जनम जनम को एकहिं, हैं ब्रजराज-दुलार।

6वे “कृपालु” मोहि तजें भजें या, करत न याय विचार॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! तुम जाकर उन लबरों के सरदार नन्दनन्दन से कह देना कि हम सब अबला हैं। हमारे कोई बल नहीं है। किसी के कुछ बल होता है किसी के कुछ, किन्तु हम अबलाओं के बल तो एकमात्र श्यामसुन्दर ही हैं। किसी के पुत्र, पति, स्त्री, बहिन हजारों नातेदार होते हैं किन्तु हमारे तो अनन्त जन्मों तक के लिए एक ही नातेदार श्यामसुन्दर हैं कृपालु' के शब्दों में वे मेरा परित्याग कर दें अथवा मुझसे प्यार करें हम लोग इस पर कुछ विचार नहीं करते अर्थात् हम उनसे प्यार करेंगे वे हमसे करें या न करें।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 759-760