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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 62

ऊधो!, सुनु सूधो सो ज्ञान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, sunu sūdho so gyāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, सुनु सूधो सो ज्ञान।

2तुम्हरो ज्ञान, योग साधन सब, सिद्धि प्रेम, जिय जान।

3नित्य-युक्त कहँ योग सिखावत, यह तुम्हरो अज्ञान।

4तुम्हरो योग रोग हम सब कहँ, भोग प्रेम रस पान।

5योग योग हैं सखा तुम्हारे, जिन कर कुबरिहिं ध्यान।

6हम “कृपालु” किमि जान ज्ञान कहँ, जिनके आँखि न कान॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रज गोपियाँ वेदान्ती उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव हम तुमको सीधा ज्ञान सिखाती हैं। तुम्हारा ज्ञान एवं योग आदि वास्तव में साधन स्वरूप हैं, सिद्धि तो एकमात्र प्रेम प्राप्ति ही है। तुम ऐसे भोंदू भट्ट हो कि हम सब नित्य युक्त (जिनका मन सदा श्यामसुन्दर में अनुरक्त है) को योग सिखाने आये हो। तुम्हारा योग तो हम लोगों के लिए रोग के समान है। हम योगी नहीं हैं, हम तो दिव्य प्रेमरस के भोगी हैं। योग के तो तुम्हारे श्यामसुन्दर ही हैं, जिनकी अत्यन्त कुरूपा कुबरी में भी पराकाष्ठा की आसक्ति है। 'कृपालु' कहते हैं कि हे उद्धव! हम तुम्हारे ज्ञान को किस प्रकार जान सकते हैं जबकि हमारे आँख-कान ही नहीं हैं अर्थात् हमारी आँखें एक मात्र श्यामसुन्दर को ही देखना चाहती हैं एवं हमारे कान उन्हीं के गुणों में अनुरक्त हैं अथवा दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि हे उद्धव! हम उस ब्रह्म के ज्ञान को कैसे जान सकते हैं जिस निराकार ब्रह्म के न आँख हैं, न कान!

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 758-759