विरह-माधुरी · पद 61
ऊधो!, सुनु चारिहुँ श्रुति सार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, sunu chārihuṁ shruti sāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, सुनु चारिहुँ श्रुति सार।
2"तत्त्वमसीति"कहत जो वाको, करु गंभीर विचार।
3"तस्य त्वं"यह है समास तहँ,"उसका तू"उर धार।
4ब्रह्मज्ञान जानिहूँ, ज्ञानी, रचि न सकत संसार।
5सूत्र"जगद्व्यापारवर्जमिति", इहै भाव विस्तार।
6है “कृपालु” आनंद भोग में, समता दोउ इकसार॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रज गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि उद्धव! वेदों का वास्तविक सार सुनो-तुम तो 'तत्वमसि 'इस वेदवाणी को बार-बार दोहराते हो, उसके अर्थ पर गम्भीर विचार करो। उसमें "तस्य त्वं ''तत्त्वम् 'यह षष्ठी तत्पुरुष समास है, जिसका अर्थ है जीव ब्रह्म का है। इसके अतिरिक्त 'ब्रह्मसूत्र'के अनुसार भी "जगद्व्यापारवर्जम्'इस सूत्र का यही भावार्थ है कि ब्रह्म को जान लेने पर भी पूर्ण ब्रह्म ज्ञानी भी सृष्टि आदि का कार्य नहीं कर सकता। 'कृपालु' कहते हैं कि ब्रह्मसूत्र के अनुसार ही यह सिद्ध है कि जीव ब्रह्म की समता ब्रह्म की प्राप्ति के पश्चात् ब्रह्मानंद भोगने मात्र में है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 757-758