विरह-माधुरी · पद 60
ऊधो सरस प्रेम रस पाये।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho sarasa prema rasa pāye
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो सरस प्रेम रस पाये।
2ज्ञान सँदेशा दे आये अरु, प्रेम सँदेशा लाये।
3ज्ञान-योग सब दै आये अरु, प्रेम रोग लै आये।
4निर्गुण ब्रह्म भूलि आये तहँ, सगुण ब्रह्म मन भाये।
5गये बनावन चेला जिन कहँ, तिन कहँ गुरू बनाये।
6हँसी, “कृपालु” करन गये प्रेमिन, ज्ञानिन हँसी कराये॥
हिन्दी भावार्थ
गोपांगनाओं की अनुकम्पा से उद्धव ने सरस प्रेम रस प्राप्त कर लिया। सदा के लिये अपना ज्ञान संदेशा गोपियों को दे आये एवं प्रेम का संदेशा ले आये। ज्ञान एवं योग को गोपियों के चरणों में समर्पित करके प्रेम का रोग साथ ले आये। अपना निर्गुण ब्रह्म गोपियों के पास ही भूल आये एवं सगुण ब्रह्म में अनुरक्त हो गये। जिन गोपियों को चेला बजाने के लिये गये थे उन्हें गुरु बना कर लौटे। 'कृपालु' कहते हैं कि प्रेमियों की हँसी करने गये थे किन्तु ज्ञानियों की हँसी कराके लौरे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 757