# ऊधो सरस प्रेम रस पाये।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0811-M19-K060
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 60
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 379–379

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो सरस प्रेम रस पाये।  
<a id="line-2"></a>ज्ञान सँदेशा दे आये अरु, प्रेम सँदेशा लाये।  
<a id="line-3"></a>ज्ञान-योग सब दै आये अरु, प्रेम रोग लै आये।  
<a id="line-4"></a>निर्गुण ब्रह्म भूलि आये तहँ, सगुण ब्रह्म मन भाये।  
<a id="line-5"></a>गये बनावन चेला जिन कहँ, तिन कहँ गुरू बनाये।  
<a id="line-6"></a>हँसी, “कृपालु” करन गये प्रेमिन, ज्ञानिन हँसी कराये॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

गोपांगनाओं की अनुकम्पा से उद्धव ने सरस प्रेम रस प्राप्त कर लिया। सदा के लिये अपना ज्ञान संदेशा गोपियों को दे आये एवं प्रेम का संदेशा ले आये। ज्ञान एवं योग को गोपियों के चरणों में समर्पित करके प्रेम का रोग साथ ले आये। अपना निर्गुण ब्रह्म गोपियों के पास ही भूल आये एवं सगुण ब्रह्म में अनुरक्त हो गये। जिन गोपियों को चेला बजाने के लिये गये थे उन्हें गुरु बना कर लौटे। 'कृपालु' कहते हैं कि प्रेमियों की हँसी करने गये थे किन्तु ज्ञानियों की हँसी कराके लौरे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 757

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
