लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 59

ऊधो!, वे सब जानन हार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, ve saba jānanahāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, वे सब जानन हार।

2हौं उतनो जानति नहिं जितनो, जानत नंदकुमार।

3हम जानति वे अंतर्यामी, सगुण ब्रह्म साकार।

4करन विश्व कल्याण नंद घर, प्रकट्यो लै अवतार।

5उनके चरित विचित्र न जानत, विधि हरि हर अनुहार।

6हम “कृपालु” व्यवधान करें किमि, उन आचरन मझार॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! वे सब कुछ जानते हैं। जितना वे जानते हैं उतना हम लोग नहीं जानतीं। हम इतना अवश्य जानती हैं कि वे सर्वान्तर्यामी सगुण साकार भगवान् हैं एवं विश्व-कल्याण के लिए नंद के घर में अवतार लेकर प्रकट हुए हैं। उनकी लीलाएँ कल्याणमयी एवं विलक्षण हैं। जिनके अन्तरंग रहस्य को ब्रह्मा, विष्णु, शंकर सरीखे भी नहीं जान पाते। 'कृपालु' के शब्दों में हम लोग उनके कार्यों में बाधक नहीं बनना चाहतीं, वे जो कुछ कर रहे हैं निस्सन्देह ठीक ही होगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 756