विरह-माधुरी · पद 58
ऊधो!, इहै ज्ञान को सार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, ihai gyāna ko sāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, इहै ज्ञान को सार।
2ब्रह्मलोक पर्यंत भोग अरु, तजि दे मुक्ति हुँ चार।
3ह्वै निष्काम तैलधारावत, भजि ले नंदकुमार।
4ज्यों नृप ज्ञान मात्र ते पाव न, पुरस्कार उपहार।
5अरु ज्यों व्यंजन ज्ञानमात्र ते, तृप्ति न होति विचार।
6तिमि “कृपालु” कोउ ज्ञानमात्र ते, रस न पाव संसार॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रज बनिताएं ज्ञानी उद्धव से कहती हैं कि वास्तव में ज्ञान का यही सार है कि ब्रह्मलोक पर्यन्त के ऐश्वर्यों का भोग एवं चार प्रकार की मुक्तियों का परित्याग कर दे। निष्काम होकर तेल की धारा के समान निरन्तर नन्दकुमार का भजन करे। जिस प्रकार राजा के ज्ञान मात्र से कोई उसके द्वारा इनाम या भेंट नहीं प्राप्त कर सकता तथा जिस प्रकार षड्रस व्यंजन के ज्ञान मात्र से अथवा विचार मात्र से किसी की तृप्ति नहीं हो सकती। 'कृपालु' कहते हैं कि ठीक उसी प्रकार थोथे ज्ञान मात्र से किसी को रस नहीं मिल सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 755-756