विरह-माधुरी · पद 57
ऊधो!, यह वेदांत विचार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, yaha vedānta vichāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, यह वेदांत विचार।
2जीव, ब्रह्म, माया अनादि ये, तीन तत्व उर धार।
3माया-जीव, शक्ति हैं जाकी, सोइ ब्रह्म करतार।
4जीव शक्ति आधीन ब्रह्म के, इमि श्रुति कहति पुकार।
5हैं दोउ एक शरीर शरीरी, यह अद्वैत निहार।
6अणु “कृपालु” है जीव, ब्रह्म विभु, जानु द्वैत को सार॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रज गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव। बेदान्त का वास्तविक विचार यह है कि जीव, ब्रह्म एवं माया तीनों तत्व अनादि हैं। माया एवं जीव जिसकी शक्ति हैं वह सर्वशक्तिमान ब्रह्म है, वही सृष्टिकर्ता है। जीव शक्ति ब्रह्म के आधीन है ऐसा वेदों का उद्घोष है। जिस प्रकार शरीर एवं शरीरी दोनों ही एक हैं उसी प्रकार जीव एवं ब्रह्म भी एक हैं-यही अद्वैत समझो। 'कृपालु' कहते हैं कि जीव सूक्ष्म है ब्रह्म व्यापक है, यही जीव ब्रह्म का भेदात्मक द्वैत समझो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 755