विरह-माधुरी · पद 56
ऊधो!, यह रहस्य की बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, yaha rahasya kī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, यह रहस्य की बात।
2अति अड़बंगी रीति प्रीति की, तुम नहिं समुझि सकात।
3तुम जानत हम मधुर मिलन हित, तलफत नित दिन-रात।
4पै मोहिं, जित देखौं तित दीखत, सुंदर श्यामल गात।
5गोपी श्याम-वियोग मान सोइ, जाकी मति भरमात।
6हम “कृपालु” दोउ एक हुते, हैं, रहिहैं एकहिं तात॥
हिन्दी भावार्थ
गोपियाँ ज्ञानी उद्धव से कहती हैं कि एक रहस्य की बात सुनो। प्रीति की रीति अत्यन्त ही टेढ़ी होती है, तुम नहीं समझ सकते। तुम यह समझते हो कि हम लोग श्यामसुन्दर के मिलन के लिए निरन्तर व्याकुल रहती हैं, पर यह बात नहीं है। हम लोग तो जिधर भी देखती हैं एक मात्र श्यामसुन्दर ही दिखाई पड़ते हैं। गोपियों एवं श्यामसुन्दर का वियोग वही मानता है जिसकी बुद्धि में भ्रम पैदा हो गया हो। 'कृपालु' के शब्दों में गोपियाँ कहती हैं कि हम एवं श्यामसुन्दर अनादि काल से एक थे, एक हैं तथा एक ही रहेंगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 754-755