# ऊधो!, सुनु चारिहुँ श्रुति सार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0812-M19-K061
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 61
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 380–380

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, सुनु चारिहुँ श्रुति सार।  
<a id="line-2"></a>"तत्त्वमसीति"कहत जो वाको, करु गंभीर विचार।  
<a id="line-3"></a>"तस्य त्वं"यह है समास तहँ,"उसका तू"उर धार।  
<a id="line-4"></a>ब्रह्मज्ञान जानिहूँ, ज्ञानी, रचि न सकत संसार।  
<a id="line-5"></a>सूत्र"जगद्व्यापारवर्जमिति", इहै भाव विस्तार।  
<a id="line-6"></a>है “कृपालु” आनंद भोग में, समता दोउ इकसार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ब्रज गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि उद्धव! वेदों का वास्तविक सार सुनो-तुम तो 'तत्वमसि 'इस वेदवाणी को बार-बार दोहराते हो, उसके अर्थ पर गम्भीर विचार करो। उसमें "तस्य त्वं ''तत्त्वम् 'यह षष्ठी तत्पुरुष समास है, जिसका अर्थ है जीव ब्रह्म का है। इसके अतिरिक्त 'ब्रह्मसूत्र'के अनुसार भी "जगद्व्यापारवर्जम्'इस सूत्र का यही भावार्थ है कि ब्रह्म को जान लेने पर भी पूर्ण ब्रह्म ज्ञानी भी सृष्टि आदि का कार्य नहीं कर सकता। 'कृपालु' कहते हैं कि ब्रह्मसूत्र के अनुसार ही यह सिद्ध है कि जीव ब्रह्म की समता ब्रह्म की प्राप्ति के पश्चात् ब्रह्मानंद भोगने मात्र में है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 757-758

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
