# ऊधो!, हम पूछति इक बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0816-M19-K065
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 65
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 381–381

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, हम पूछति इक बात।  
<a id="line-2"></a>तुम तो कहत जगत मिथ्या यह, सुनि अचरज दरसात।  
<a id="line-3"></a>व्यापक ब्रह्म मान, पुनि जीवहुँ, ब्रह्महिं मानत जात।  
<a id="line-4"></a>पुनि है मिथ्या तत्व कौन जो, तुम कहँ जगत लखात?।  
<a id="line-5"></a>मिथ्याभान ज्ञान महँ कैसे?, प्रत्युत्तर दो तात।  
<a id="line-6"></a>भये “कृपालु” निरुत्तर ऊधो, मन ही मन खिसियात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

गोपियाँ ज्ञानी उद्धव से कहती हैं कि हम तुमसे एक बात पूछती हैं तुम जो संसार को मिथ्या कहते हो, इसे सुनकर हमको महान् आश्चर्य होता है। में व्यापक मानते हो एवं परमाणुओं से भी सूक्ष्म जीवात्मा को ब्रह्म ही मानते हो, फिर वह कौन मिथ्या तत्व बचा जो तुम्हें संसार स्वरूप दिखाई पड़ता है? कि कोई अन्य मिथ्या तत्व है भी, तो भी ब्रह्म ज्ञान होने पर उस मिथ्या तत्व का भान कैसे रह सकता है? इसका उत्तर दो। उद्धव कुछ भी उत्तर न दे सके एवं मन ही मन अत्यन्त खिसिया गये।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 761

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
