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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 66

ऊधो!, हम भोरी ब्रजनार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, hama bhorī brajanāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, हम भोरी ब्रजनार।

2तन मन, प्रान सबै सँग लै गयो, ठगि ठाकुर ठगहार।

3"अइहैं प्राणनाथ"येहि आशा, प्राणहीन तनु धार।

4गिरा अर्थ जिमि विलग न रहि सक, कोउ कर यतन हजार।

5इमि जिय आन, न मान वियोगिनि, रोम रोम रिझवार।

6तुम “कृपालु” ऊधो! का जानो, माधो जाननिहार॥

हिन्दी भावार्थ

उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! हम समस्त ब्रज ललनायें अत्यन्त भोली-भाली हैं। तुम्हारे लुटेरे सखा ने हमारे तन, मन, प्राण सबका हरण कर लिया है एवं उन सबको वे अपने साथ ले गये हैं। हम लोग "प्राणनाथ अवश्य आयेंगे'इस आशा में प्राणहीन शरीर धारण किये हुए हैं किन्तु उद्धव! सावधान होकर सुनो- जिस प्रकार करोड़ों प्रयत्न करने पर भी वाणी एवं उसका अर्थ पृथक नहीं हो सकता, उसी प्रकार हमसे हमारे रोम-रोम में व्याप्त श्यामसुन्दर भी पृथक नहीं हो सकते। अतएव तुम हमें श्यामसुन्दर को वियोगिनी न मान लेना। 'कृपालु' कहते हैं कि हे उद्धव। प्रेम की इन अटपटी बातों को तुम क्या जानोगे, एकमात्र श्यामसुन्दर ही जानने वाले हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 761-762