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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 67

ऊधो!, हम मतिमंद गमार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, hama matimanda gamāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, हम मतिमंद गमार।

2जाय कह्यो उन पिय लंपट सों, जिन किय कुबरिहिं नार।

3हम नहिं जान नाम निगमागम, ज्ञानाज्ञान विचार।

4जो मो कहँ रह जोग सिखावन, प्रथम कियो क्यों प्यार?।

5अब मन बुधि हरि जोग सिखावत, धनि-धनि हरि बलिहार।

6बिनु मन बुद्धि “कृपालु” जान जो, सो समरथ भरतार॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ नन्दनन्दन को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! उन कुब्जा के पति से जाकर कह देना। हम सब तो अत्यन्त मूर्ख हैं, निरक्षर हैं। शास्त्रों वेदों का नाम भी नहीं जानतीं, क्या ज्ञान है एवं क्या आज्ञान है, यह भी नहीं जानतीं। किन्तु इतना अवश्य कह सकती हैं कि यदि हम लोगों को योग म ही सिखाना था तो प्रथम उन्होंने इतना अधिक प्यार क्यों किया? उद्धव भला यह कैसे सम्भव है कि मन बुद्धि तो वे अपने पास रखें और बिना मन बुद्धि के हम लोग ज्ञान सीखें। कृपालु' कहते हैं कि बिना मन बुद्धि के जानने वाले एकमात्र समर्थ श्यामसुन्दर ही हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 762-763