विरह-माधुरी · पद 68
ऊधो!, हमरे आँखि न कान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, hamare āṁkhi na kāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, हमरे आँखि न कान।
2जाइ कह्यो उन मनमोहन सों, जो कुब्जा के प्रान।
3जाके आँखि होति जग महँ सो, चलत देखि जिय जान।
4पै हमरे तो आँखि एक बस, सुंदर श्याम-सुजान।
5जाके कान होत जग महँ सो, सुनि समुझत कछु ज्ञान।
6पै “कृपालु” हमरे कानन तो, इक पिय-मुरली-तान॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! उन कुब्जा के जीवन धन मनमोहन से जाकर कह देना कि हमारे न तो आँख है न कान है। आँख होती है वह देख -देखकर कदम रखता है किन्तु हमारी आँखें तो एक मात्र श्यामसुन्दर को ही देख सकती हैं और कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता। संसार में जिसके कान होते हैं वह सुन कर कुछ ज्ञान आदि समझता है। कहती है कि मेरे कान तो एकमात्र श्यामसुन्दर के गुणों, उन्हीं के मुख से निकले हुए शब्दों एवं उनकी मुरली से निकली तान को सुनने की ही सामर्थ्य रखते हैं अन्य कोई भी शब्द सुनाई ही नहीं पड़ता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 763