विरह-माधुरी · पद 69
ऊधो!, हम सूधी ब्रज-बाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, hama sūdhī brajabāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, हम सूधी ब्रज-बाम।
2तुम्हरे सखा श्यामसुंदर कहँ, टेढ़ो ही सब काम।
3मुकुट, ग्रीव, कटि, पद टेढ़ो करि, ठड़े होत घनश्याम।
4टेढ़ो नैन, मैन मदमाते, टेढ़े सैन ललाम।
5टेढ़ी प्रीति, रीतिहू टेढ़ी, टेढ़ी गति अभिराम।
6ताही ते “कृपालु” अति टेढ़ी, भाई कुब्जा बाम॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रज गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! हम ब्रजांगनाएँ तो सीधी-सादी हैं, तुम्हारे सखा श्यामसुन्दर को तो टेढ़ी वस्तुएँ ही पसन्द हैं। देखो तो! वे मुकुट, गर्दन, कमर और पैर टेढ़ा करके खड़े होते हैं। उनके मतवाले नैन एवं नैनों के कटाक्ष भी टेढ़े हैं। उनकी प्रीति एवं प्रीति की रीति भी टेढ़ी है। उनकी चाल भी टेढ़ी है। इतने में 'कृपालु' ने कहा कि सखियों! इसीलिए तो सर्वाधिक टेढ़ी कुबरी में वे आसक्त हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 764