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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 50

ऊधो!, धन्य हमारो भाग।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, dhanya hamāro bhāga

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, धन्य हमारो भाग।

2प्रियतम-प्राणसखा-प्रिय दर्शन, हर्ष बुझी विरहाग।

3यह मन नहिं अब हाथ हमारे, रह्यो प्रेम-रस पाग।

4रोम रोम मोहन मोहिनि-छवि, उरझी अति अनुराग।

5कौनेहुँ जनम अवशि पिय मिलिहैं, यह आशा उर लाग।

6ज्ञान “कृपालु” परमहंसन कहँ, किमि जानें हम काग॥

हिन्दी भावार्थ

(श्रीकृष्ण विरहिणी ब्रज-गोपियाँ उद्धव को धन्यवाद देती हुई कहती हैं।) हे उद्धव! हम ब्रज-गोपियाँ अत्यन्त ही भाग्यशालिनी है एवं हम सब परम धन्य हैं। प्राणाधिक-प्रिय श्यामसुन्दर प्राणसखा के मधुर-दर्शनों के आनन्द से हम लोगों की विरहाग्नि शान्त हो गयी। हे उद्धव! प्रेम रस में सराबोर मेरा मन अब में ही हाथ में नहीं है। क्या करूँ? मेरे प्रत्येक रोम-रोम में प्रियतम की सलोनी सूरत दृढ़ आनुरागपूर्वक उलझ चुकी है एवं हृदय में पूर्ण विश्वासयुक्त आशा है कि किसी-न-किसी जन्म में प्रियतम अवश्य मिलेंगे। "कृपालु 'व्यंग्य भरे शब्दों में कहते है कि हे उद्धव! ज्ञान तो परमहँस-रूपी बड़े-बड़े हंसों के लिए है, हम सब प्रेम के बंधन में बँधे हुए कौवे इसे क्या समइ सकते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 748-749