विरह-माधुरी · पद 51
ऊधो!, बलिहारी येहि ज्ञान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, balihārī yehi gyāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, बलिहारी येहि ज्ञान।
2जीवहिं ब्रह्म कहत तुम मोते, मायहिं मिथ्या जान।
3हम पूछति तुम ज्ञान देत केहि, जीवात्महिं या आन?।
4यदि"जीवात्मा ब्रह्म", ज्ञान कस?, मिथ्या आन बखान।
5हम पूछति अज्ञान सादि है, या अनादि अज्ञान?।
6यदि अनादि कह, ब्रह्म एक कस?, सोचहु मनहिं सुजान।
7कत अज्ञान “कृपालु” ज्ञान हर, सादि लेहु यदि मान॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनायेँ ज्ञानी उद्धव से कहती हैं कि तुम्हारे ज्ञान की बलिहारी है कि तुम मुझसे कहते हो कि जीवात्मा ब्रह्म र एवं माया मिथ्या है, उसका कोई अस्तित्व नहीं। तो हम तुमे म पूछती हैं कि तुम ज्ञान किसको दे रहे हो। जीवात्मा को अथवा किसी और को? यदि जीवात्मा को ज्ञान दे रहे हो तो वह तुम्हारे सिद्धांतानुसार नित्यज्ञानमय ब्रह्म ही है। यदि किसी और तत्व को ज्ञान दे रहे हो, तो तुम्हारे मतानुसार यह मिथ्या है। उसकी सत्ता ही नहीं है। हम पुनः पूछती हैं कि तुम अज्ञान को सादि (एक दिन शुरू हुआ था) मानते हो या अनादि (जिसकी कभी शुरूआत न हुई हो) मानते हो? यदि अनादि मानते हो तब तो ब्रह्म एवं अज्ञान दोनों ही अनादि तत्व सिद्ध हो जायेंगे, जब कि तुम अज्ञान को सादि मानते हो। 'कृपालु' कहते हैं कि यदि तुम अज्ञान को सादि मानते हो तो इसका अभिप्राय यह होता है कि अज्ञान के पूर्व ज्ञान ही था फिर ज्ञान के ऊपर अज्ञान का अधिकार कैसे सम्भव है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 749-750