# ऊधो!, बलिहारी येहि ज्ञान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0802-M19-K051
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 51
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 375–376

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, बलिहारी येहि ज्ञान।  
<a id="line-2"></a>जीवहिं ब्रह्म कहत तुम मोते, मायहिं मिथ्या जान।  
<a id="line-3"></a>हम पूछति तुम ज्ञान देत केहि, जीवात्महिं या आन?।  
<a id="line-4"></a>यदि"जीवात्मा ब्रह्म", ज्ञान कस?, मिथ्या आन बखान।  
<a id="line-5"></a>हम पूछति अज्ञान सादि है, या अनादि अज्ञान?।  
<a id="line-6"></a>यदि अनादि कह, ब्रह्म एक कस?, सोचहु मनहिं सुजान।  
<a id="line-7"></a>कत अज्ञान “कृपालु” ज्ञान हर, सादि लेहु यदि मान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनायेँ ज्ञानी उद्धव से कहती हैं कि तुम्हारे ज्ञान की बलिहारी है कि तुम मुझसे कहते हो कि जीवात्मा ब्रह्म र एवं माया मिथ्या है, उसका कोई अस्तित्व नहीं। तो हम तुमे म पूछती हैं कि तुम ज्ञान किसको दे रहे हो। जीवात्मा को अथवा किसी और को? यदि जीवात्मा को ज्ञान दे रहे हो तो वह तुम्हारे सिद्धांतानुसार नित्यज्ञानमय ब्रह्म ही है। यदि किसी और तत्व को ज्ञान दे रहे हो, तो तुम्हारे मतानुसार यह मिथ्या है। उसकी सत्ता ही नहीं है। हम पुनः पूछती हैं कि तुम अज्ञान को सादि (एक दिन शुरू हुआ था) मानते हो या अनादि (जिसकी कभी शुरूआत न हुई हो) मानते हो? यदि अनादि मानते हो तब तो ब्रह्म एवं अज्ञान दोनों ही अनादि तत्व सिद्ध हो जायेंगे, जब कि तुम अज्ञान को सादि मानते हो। 'कृपालु' कहते हैं कि यदि तुम अज्ञान को सादि मानते हो तो इसका अभिप्राय यह होता है कि अज्ञान के पूर्व ज्ञान ही था फिर ज्ञान के ऊपर अज्ञान का अधिकार कैसे सम्भव है?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 749-750

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
