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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 49

ऊधो!, धन्य तुम्हारो ज्ञान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, dhanya tumhāro gyāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, धन्य तुम्हारो ज्ञान।

2सब कुछ ब्रह्म, कहत ज्ञानी-जन, तुम कह हमहिं अयान।

3पुनि अधिकारिहुँ भेद न जानत, करन चहत कल्यान।

4जिनको मन लै गयो श्याम, सो, कैसे धरिहैं ध्यान।

5यह छल-ज्ञान उनहिं समुझाइय, जो छल-कपट निधान।

6ह्याँ “कृपालु” नहिं चलिय ठगोरी, खोलिय अनत दुकान॥

हिन्दी भावार्थ

श्रीकृष्ण वियोगिनी ब्रज-गोपिकाएँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! तुम्हारे ज्ञान को धन्य है, जो ऐसी अज्ञानता की आातें करते हो। ज्ञानीजन तो, 'ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ है नहीं ऐसा कहते हैं किन्तु तुम ऐसे विचित्र ज्ञानी हो जो हम सबको अज्ञानी कहते हो। फिर तुमको कदाचित् यह भी ज्ञान नहीं है कि साधन-चतुष्टय-सम्पन्न जीव ही ज्ञानमार्ग का अधिकारी होता है। फिर भला तुम किसी का कल्याण करने किस प्रकार निकले हो। अरे उद्धव! जिसके मन को श्यामसुन्दर अपने साथ ही ले गये हैं, वह भला किस मन से चिंतन आदि करे। यह कपटमय ज्ञान उन्हीं श्यामसुन्दर को समझाना जो छल एवं कपट के भण्डार हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हे उद्धव जी! यहाँ तुम्हारा यह ठगपना नहीं चल सकता, यह प्रेमनगर है, अतएव अब कृपा करके कहीं अन्यत्र इस दुकान को खोलिए।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 747-748