# ऊधो!, धन्य तुम्हारो ज्ञान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0800-M19-K049
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 49
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 374–375

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, धन्य तुम्हारो ज्ञान।  
<a id="line-2"></a>सब कुछ ब्रह्म, कहत ज्ञानी-जन, तुम कह हमहिं अयान।  
<a id="line-3"></a>पुनि अधिकारिहुँ भेद न जानत, करन चहत कल्यान।  
<a id="line-4"></a>जिनको मन लै गयो श्याम, सो, कैसे धरिहैं ध्यान।  
<a id="line-5"></a>यह छल-ज्ञान उनहिं समुझाइय, जो छल-कपट निधान।  
<a id="line-6"></a>ह्याँ “कृपालु” नहिं चलिय ठगोरी, खोलिय अनत दुकान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्रीकृष्ण वियोगिनी ब्रज-गोपिकाएँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! तुम्हारे ज्ञान को धन्य है, जो ऐसी अज्ञानता की आातें करते हो। ज्ञानीजन तो, 'ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ है नहीं ऐसा कहते हैं किन्तु तुम ऐसे विचित्र ज्ञानी हो जो हम सबको अज्ञानी कहते हो। फिर तुमको कदाचित् यह भी ज्ञान नहीं है कि साधन-चतुष्टय-सम्पन्न जीव ही ज्ञानमार्ग का अधिकारी होता है। फिर भला तुम किसी का कल्याण करने किस प्रकार निकले हो। अरे उद्धव! जिसके मन को श्यामसुन्दर अपने साथ ही ले गये हैं, वह भला किस मन से चिंतन आदि करे। यह कपटमय ज्ञान उन्हीं श्यामसुन्दर को समझाना जो छल एवं कपट के भण्डार हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हे उद्धव जी! यहाँ तुम्हारा यह ठगपना नहीं चल सकता, यह प्रेमनगर है, अतएव अब कृपा करके कहीं अन्यत्र इस दुकान को खोलिए।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 747-748

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
