विरह-माधुरी · पद 48
ऊधो!, धनि तव ज्ञान विचार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, dhani tava gyāna vichāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, धनि तव ज्ञान विचार।
2तुम कह,"निज स्वरूप चीन्हे बिनु, बँध्यो जीव तनुधार"।
3शिशु न जान कोउ मातु पितहिं पै, होत न पशु संसार।
4बिनु जाने कोउ अगिनि छुवे तो, होत न शीत तुषार।
5माया, शक्ति ब्रह्म की श्रुति कह, बारम्बार पुकार।
6सुनि “कृपालु” ऊधो भये सूधो, बह्यो प्रेम जलधार॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रज गोपियाँ ज्ञानी उद्धव से कहती हैं कि तुम्हा इस अज्ञानमय ज्ञान को धन्य है! तुम कहते हो कि जीवात्म बिना आत्मस्वरूप को पहिचाने ही कर्मबन्धन में बँधा हुआ त और चौरासी लाख योनियों में भटक रहा है परन्तु मैं कहती हू कि तुरन्त का पैदा हुआ बच्चा अपने माता-पिता को नहँ पहिचानता तो क्या वह गाय भैंस का बच्चा हो जाता है? फिर पूछती हूँ कि बिना जाने अगर कोई अग्नि का स्पर्श को तो क्या अग्नि उसके लिए उण्डी बर्फ बन जाती है? तुम माय को मिथ्या कहकर टाल देते हो जबकि वेद बारम्बार पुका कर कहता है कि माया तो ब्रह्म की शक्ति है। 'कृपालु' कहर हैं कि गोपियों के इन अकाट्य तर्को को सुनकर उद्धवजी क दिमाग दुरुस्त हो गया एवं आँखों से प्रेम की अश्रुधारा बः चली।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 747