विरह-माधुरी · पद 47
ऊधो!, धनि तव ज्ञान प्रचार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, dhani tava gyāna prachāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, धनि तव ज्ञान प्रचार।
2हम पूछति तुम सों बिनु वानी, को जग बोलनहार।
3बिनु पग गवनि, श्रवन बिनु श्रवनन, कतहुँ लख्यो संसार।
4बिनु कर कर्म, जीभ बिनु वक्ता, निज बुधि करिय विचार।
5श्रवण मनन तिमि बिन मन बुधि कत, सो ढिंग नंदकुमार।
6हँसब ठठाय फुलाय गाल दोउ, यह करि सक करतार।
7गूदरि-ज्ञान “कृपालु” जानि यह, खोलिय हरि दरबार॥
हिन्दी भावार्थ
(श्रीकृष्ण-वियोगिनी ब्रज-गोपिकाएँ उद्धव से कहती हैं) हे उद्धव! हम तुमसे पूछती हैं कि बिना वाणी संसार में कौन बोल सकता है? बिना पैर के चलना, बिना कान के सुनना भला कैसे सम्भव है? तथा बिना हाथ के कर्म करना एवं बिना जीभ के बोलना कैसे सम्भव है? इन बातों को तुम्हीं अपनी बुद्धि से सोचो। ठीक इसी प्रकार जिसका मन एवं बुद्धि श्यामसुन्दर के पास है, वह तुम्हारे ब्रह्म ज्ञान का श्रवण, मनन किस प्रकार कर सकता है। हे उद्धव! खिलखिलाकर हँसना एवं गाल भी फुलाना यह दोनों ही विरोधी कार्य हैं, यह एक साथ वे ही कर सकते हैं। अतएव 'कृपालु' कहते हैं कि ज्ञानगुदड़ी जाकर उन्हीं के दरबार में खोलो, ब्रज में इसका ग्राहक कोई भी नहीं है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 746