विरह-माधुरी · पद 46
ऊधो!, दोष न कछु उन आय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, dosha na kachhu una āya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, दोष न कछु उन आय।
2फेंट कसे घूमत बनितनि हित, अस सुभाय बलभाय।
3जितनोइ लिख्यो भाग्य महँ सुख बस, तितनोइ सो सुख पाय।
4कूबरि को त्रिभुवन सुंदरि किय, नेकु तिलक लगवाय।
5त्रिभुवन-सुंदरि कहँ कूबरि किय, गिरति सबै कहि हाय।
6बनि कुबरी “कृपालु” हौं मधुपुरि, मिलिहौं अब हरि जाय॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! उनका कुछ दोष नहीं है। अपने स्वभावानुसार स्त्रियों के लिए कमर कसे हुए घूमते रहते हैं। सच बात तो यह है कि जिसके भाग्य में जितना सुख लिखा रहता है बस, उसको उतना ही सुख मिलता है। तो! जरा सा चंदन लगवा कर कुब्जा को लिभुवन सुन्दरी बना दिया एवं त्रिभुवन-सुन्दरी ब्रजांगनाओं को कुबरी बना दिया जिसका ज्वलन्त प्रमाण यह है कि वे सब क्षण-क्षण में हाय क कहकर पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं। अन हम लोग कुबरी का भेष बनाकर मथुरा में श्यामसुन्दर से मेलने जायेंगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 745-746