विरह-माधुरी · पद 45
ऊधो!, तुमहिं शब्द को ज्ञान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, tumahiṁ shabda ko gyāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, तुमहिं शब्द को ज्ञान।
2पढ़े वेद वेदांत बड़े तुम, पै न अर्थ कछु जान।
3निर्गुन मान ब्रह्म को तुमहूँ, हमहूँ निर्गुन मान।
4प्राकृत त्रिगुण रहित है याको, अर्थ ऋचान प्रमान।
5सगुण ब्रह्म मानत दोउन पै, तुम न अर्थ पहिचान।
6ताको अर्थ “कृपालु” कृपादिक, अगणित गुणहिं बखान॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! केवल शब्द का ही ज्ञान है, शब्दार्थ का ज्ञान नहीं है। मानती हैं कि तुमने बड़े-बड़े वेद वेदांत पढ़े होंगे किन्तु रट्टू न की तरह अर्थ नहीं समझे। कान खोलकर सुनो। निर्गुण तुम भी मानते हो और निर्गुण हम भी मानती हैं, किन्तु तुम निर्गुण शब्द का वास्तविक अर्थ नहीं जानते। सिद्धांतानुसार माया सम्बन्धी सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण इन तीनों गुणों से रहित सत्ता को ही निर्गुण माना गया है। प्रकार सगुण ब्रह्म को तुम भी मानते हो एवं हम भी मानती हैं किन्तु तुम सगुण शब्द का अर्थ नहीं जानते। हैं कि दया आदि अनन्त गुणों से युक्त ब्रह्म को ही सगुण ब्रह्म माना गया है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 744-745