# ऊधो!, तुमहिं शब्द को ज्ञान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0796-M19-K045
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 45
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 373–373

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, तुमहिं शब्द को ज्ञान।  
<a id="line-2"></a>पढ़े वेद वेदांत बड़े तुम, पै न अर्थ कछु जान।  
<a id="line-3"></a>निर्गुन मान ब्रह्म को तुमहूँ, हमहूँ निर्गुन मान।  
<a id="line-4"></a>प्राकृत त्रिगुण रहित है याको, अर्थ ऋचान प्रमान।  
<a id="line-5"></a>सगुण ब्रह्म मानत दोउन पै, तुम न अर्थ पहिचान।  
<a id="line-6"></a>ताको अर्थ “कृपालु” कृपादिक, अगणित गुणहिं बखान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! केवल शब्द का ही ज्ञान है, शब्दार्थ का ज्ञान नहीं है। मानती हैं कि तुमने बड़े-बड़े वेद वेदांत पढ़े होंगे किन्तु रट्टू न की तरह अर्थ नहीं समझे। कान खोलकर सुनो। निर्गुण तुम भी मानते हो और निर्गुण हम भी मानती हैं, किन्तु तुम निर्गुण शब्द का वास्तविक अर्थ नहीं जानते। सिद्धांतानुसार माया सम्बन्धी सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण इन तीनों गुणों से रहित सत्ता को ही निर्गुण माना गया है। प्रकार सगुण ब्रह्म को तुम भी मानते हो एवं हम भी मानती हैं किन्तु तुम सगुण शब्द का अर्थ नहीं जानते। हैं कि दया आदि अनन्त गुणों से युक्त ब्रह्म को ही सगुण ब्रह्म माना गया है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 744-745

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
