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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 44

ऊधो!, तुमहिं ज्ञान को ज्ञान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, tumahiṁ gyāna ko gyāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, तुमहिं ज्ञान को ज्ञान।

2जब लौं जगत भान रह तब लौं, जानिय तेहि अज्ञान।

3जब जग भान रहत नहिं नेकहुँ, सोई ज्ञान बखान।

4मिटइ ज्ञान, अज्ञान भान जब, ब्रह्म ज्ञान तेहि मान।

5जितनोइ ब्रह्मज्ञान उर तितनोइ, प्रकट प्रेम रस खान।

6लोकहुँ माहिं “कृपालु” ज्ञान ते, होत प्रेम सब जान॥

हिन्दी भावार्थ

प्रेम रस परिप्लुत गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्भव! तुम वास्तविक ज्ञानी नहीं हो, क्योंकि तुमको अभी ज्ञान का ज्ञान है (ज्ञानाभिमान है)। जब तक किसी व्यक्ति को संसार का भान रहता है तब तक उसे अज्ञानी ही समझना चाहिये और जब संसार का भान बिल्कुल नहीं रहता तब उसे ज्ञानी समझना चाहिये एवं जब उपयुर्क्त ज्ञान एवं अज्ञान दोनों का भान नहीं रहता तब उसे ब्रह्मज्ञानी समझना चाहिये। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण एक यह भी है कि जिसमें जितना ब्रह्मज्ञान आता जायगा उसमें उतना ही दिव्य प्रेम प्रक होता जायगा। 'कृपालु' कहते हैं कि व्यावहारिक जगत् में भी किसी तत्व के ज्ञान की मात्रा के अमुसार ही प्रेम हुआ करता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 743-744