विरह-माधुरी · पद 43
ऊधो!, तुम नहिं जानत ज्ञान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, tuma nahiṁ jānata gyāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, तुम नहिं जानत ज्ञान।
2तुम जानत हो ब्रह्म-ज्ञान भल, यदि यह लें हम मान।
3तो कत मन बुधि सों अतीत कह, वेद ब्रह्म विज्ञान।
4बुद्धिगम्य यदि ब्रह्म मान तो, ब्रह्म प्रकाशक आन।
5विज्ञाता है ब्रह्म, वेद कह, कौन ज्ञान तेहि जान।
6दै “कृपालु” अब जाहु ज्ञान सब, करहु प्रेम-रस पान॥
हिन्दी भावार्थ
गोपियाँ ज्ञानी उद्धव से कहती हैं कि तुम कुछ ज्ञान वान नहीं जानते। यदि हम यह मान भी लें कि तुम ब्रह्म ज्ञान को भली-भाँति जानते हो तो फिर "ब्रह्म मन एवं बुद्धि से पे है'इस वेद वाणी से विरोध पड़ता है और यदि हम वेद के विरुद्ध भी यह मान लें कि ब्रह्म को बुद्धि से जाना जा सकता है तो फिर ब्रह्म की प्रकाशिका बुद्धि होगी, जब कि ब्रह सर्वप्रकाशक निर्विवाद सिद्ध है। इसके अतिरिक्त वेदों का उद्घोष है कि ब्रह्म सबका विज्ञाता है (जानने वाला है) फिर उस ब्रह को किस ज्ञान से जाना जा सकता है? तब तो वही ज्ञान विज्ञाता सिद्ध होगा। 'कृपालु' कहते हैं कि हे उद्धव! तुम अपना आज्ञानमय ज्ञान गोपियों को देकर उनसे प्रेम-रस प्राप्त करके तृप्त हो जाओ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 743