# ऊधो!, तुम नहिं जानत ज्ञान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0794-M19-K043
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 43
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 372–372

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, तुम नहिं जानत ज्ञान।  
<a id="line-2"></a>तुम जानत हो ब्रह्म-ज्ञान भल, यदि यह लें हम मान।  
<a id="line-3"></a>तो कत मन बुधि सों अतीत कह, वेद ब्रह्म विज्ञान।  
<a id="line-4"></a>बुद्धिगम्य यदि ब्रह्म मान तो, ब्रह्म प्रकाशक आन।  
<a id="line-5"></a>विज्ञाता है ब्रह्म, वेद कह, कौन ज्ञान तेहि जान।  
<a id="line-6"></a>दै “कृपालु” अब जाहु ज्ञान सब, करहु प्रेम-रस पान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

गोपियाँ ज्ञानी उद्धव से कहती हैं कि तुम कुछ ज्ञान वान नहीं जानते। यदि हम यह मान भी लें कि तुम ब्रह्म ज्ञान को भली-भाँति जानते हो तो फिर "ब्रह्म मन एवं बुद्धि से पे है'इस वेद वाणी से विरोध पड़ता है और यदि हम वेद के विरुद्ध भी यह मान लें कि ब्रह्म को बुद्धि से जाना जा सकता है तो फिर ब्रह्म की प्रकाशिका बुद्धि होगी, जब कि ब्रह सर्वप्रकाशक निर्विवाद सिद्ध है। इसके अतिरिक्त वेदों का उद्घोष है कि ब्रह्म सबका विज्ञाता है (जानने वाला है) फिर उस ब्रह को किस ज्ञान से जाना जा सकता है? तब तो वही ज्ञान विज्ञाता सिद्ध होगा। 'कृपालु' कहते हैं कि हे उद्धव! तुम अपना आज्ञानमय ज्ञान गोपियों को देकर उनसे प्रेम-रस प्राप्त करके तृप्त हो जाओ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 743

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
