विरह-माधुरी · पद 42
ऊधो!, तुम दोउन इकसार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, tuma douna ika sāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, तुम दोउन इकसार।
2तुम अरु सखा तुम्हारे माधो, भले बने बटमार।
3चंदन तजि हम भसम रमावें, बाघंबर तनु धार।
4करें तुम्हारे सखा मधुपुरी, कुब्जा संग विहार।
5जेहि मन योग सिखावन आये, सो ढिंग नंदकुमार।
6मन “कृपालु” हरि के मन-मोहन, मो सन कर खिलवार॥
हिन्दी भावार्थ
गोपियाँ प्रेम की झुँझलाहट में उद्धव से कहती हैं के हे उद्धव! तुम एवं तुम्हारे सखा श्यामसुन्दर दोनों ही एक ममान हैं। दोनों ही सभ्य लुटेरे हैं। तुम ही सोचो कि हम तो गाघम्बर पहन करके चन्दन के स्थान पर भस्म लगावें और मथुरा में कुब्जा के साथ रँगरेलियाँ करें। हे उद्धव! जिस न को तुम योग सिखाने आये हो वह मन तो तुम्हारे सखा म ही पास है। 'कृपालु' कहते हैं कि हम लोगों के मन हि चुरा कर अब श्यामसुन्दर हमारे प्राणों के साथ खेल कर रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 742