# ऊधो!, तुमहिं ज्ञान को ज्ञान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0795-M19-K044
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 44
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 372–373

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, तुमहिं ज्ञान को ज्ञान।  
<a id="line-2"></a>जब लौं जगत भान रह तब लौं, जानिय तेहि अज्ञान।  
<a id="line-3"></a>जब जग भान रहत नहिं नेकहुँ, सोई ज्ञान बखान।  
<a id="line-4"></a>मिटइ ज्ञान, अज्ञान भान जब, ब्रह्म ज्ञान तेहि मान।  
<a id="line-5"></a>जितनोइ ब्रह्मज्ञान उर तितनोइ, प्रकट प्रेम रस खान।  
<a id="line-6"></a>लोकहुँ माहिं “कृपालु” ज्ञान ते, होत प्रेम सब जान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्रेम रस परिप्लुत गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्भव! तुम वास्तविक ज्ञानी नहीं हो, क्योंकि तुमको अभी ज्ञान का ज्ञान है (ज्ञानाभिमान है)। जब तक किसी व्यक्ति को संसार का भान रहता है तब तक उसे अज्ञानी ही समझना चाहिये और जब संसार का भान बिल्कुल नहीं रहता तब उसे ज्ञानी समझना चाहिये एवं जब उपयुर्क्त ज्ञान एवं अज्ञान दोनों का भान नहीं रहता तब उसे ब्रह्मज्ञानी समझना चाहिये। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण एक यह भी है कि जिसमें जितना ब्रह्मज्ञान आता जायगा उसमें उतना ही दिव्य प्रेम प्रक होता जायगा। 'कृपालु' कहते हैं कि व्यावहारिक जगत् में भी किसी तत्व के ज्ञान की मात्रा के अमुसार ही प्रेम हुआ करता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 743-744

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
