# ऊधो!, धनि तव ज्ञान विचार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0799-M19-K048
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 48
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 374–374

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, धनि तव ज्ञान विचार।  
<a id="line-2"></a>तुम कह,"निज स्वरूप चीन्हे बिनु, बँध्यो जीव तनुधार"।  
<a id="line-3"></a>शिशु न जान कोउ मातु पितहिं पै, होत न पशु संसार।  
<a id="line-4"></a>बिनु जाने कोउ अगिनि छुवे तो, होत न शीत तुषार।  
<a id="line-5"></a>माया, शक्ति ब्रह्म की श्रुति कह, बारम्बार पुकार।  
<a id="line-6"></a>सुनि “कृपालु” ऊधो भये सूधो, बह्यो प्रेम जलधार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ब्रज गोपियाँ ज्ञानी उद्धव से कहती हैं कि तुम्हा इस अज्ञानमय ज्ञान को धन्य है! तुम कहते हो कि जीवात्म बिना आत्मस्वरूप को पहिचाने ही कर्मबन्धन में बँधा हुआ त और चौरासी लाख योनियों में भटक रहा है परन्तु मैं कहती हू कि तुरन्त का पैदा हुआ बच्चा अपने माता-पिता को नहँ पहिचानता तो क्या वह गाय भैंस का बच्चा हो जाता है? फिर पूछती हूँ कि बिना जाने अगर कोई अग्नि का स्पर्श को तो क्या अग्नि उसके लिए उण्डी बर्फ बन जाती है? तुम माय को मिथ्या कहकर टाल देते हो जबकि वेद बारम्बार पुका कर कहता है कि माया तो ब्रह्म की शक्ति है। 'कृपालु' कहर हैं कि गोपियों के इन अकाट्य तर्को को सुनकर उद्धवजी क दिमाग दुरुस्त हो गया एवं आँखों से प्रेम की अश्रुधारा बः चली।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 747

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
