# ऊधो!, धन्य हमारो भाग।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0801-M19-K050
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 50
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 375–375

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, धन्य हमारो भाग।  
<a id="line-2"></a>प्रियतम-प्राणसखा-प्रिय दर्शन, हर्ष बुझी विरहाग।  
<a id="line-3"></a>यह मन नहिं अब हाथ हमारे, रह्यो प्रेम-रस पाग।  
<a id="line-4"></a>रोम रोम मोहन मोहिनि-छवि, उरझी अति अनुराग।  
<a id="line-5"></a>कौनेहुँ जनम अवशि पिय मिलिहैं, यह आशा उर लाग।  
<a id="line-6"></a>ज्ञान “कृपालु” परमहंसन कहँ, किमि जानें हम काग॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्रीकृष्ण विरहिणी ब्रज-गोपियाँ उद्धव को धन्यवाद देती हुई कहती हैं।) हे उद्धव! हम ब्रज-गोपियाँ अत्यन्त ही भाग्यशालिनी है एवं हम सब परम धन्य हैं। प्राणाधिक-प्रिय श्यामसुन्दर प्राणसखा के मधुर-दर्शनों के आनन्द से हम लोगों की विरहाग्नि शान्त हो गयी। हे उद्धव! प्रेम रस में सराबोर मेरा मन अब में ही हाथ में नहीं है। क्या करूँ? मेरे प्रत्येक रोम-रोम में प्रियतम की सलोनी सूरत दृढ़ आनुरागपूर्वक उलझ चुकी है एवं हृदय में पूर्ण विश्वासयुक्त आशा है कि किसी-न-किसी जन्म में प्रियतम अवश्य मिलेंगे। "कृपालु 'व्यंग्य भरे शब्दों में कहते है कि हे उद्धव! ज्ञान तो परमहँस-रूपी बड़े-बड़े हंसों के लिए है, हम सब प्रेम के बंधन में बँधे हुए कौवे इसे क्या समइ सकते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 748-749

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
