विरह-माधुरी · पद 39
ऊधो!, तजु अद्वैत विचार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, taju advaita vichāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, तजु अद्वैत विचार।
2सृष्टि आदि जो करत ब्रह्म सो, अस कह वेद पुकार।
3जीव ब्रह्म को अंतर केतिक, सुनहु कहति श्रुति चार।
4एक व्याप्य, इक व्यापक, इक है, भृत्य एक भरतार।
5एक अंश, इक अंशी, इक है, सुत, इक पितु करतार।
6एक प्रेर्य, इक प्रेरक, इक है, अणु इक विभु उर धार।
7इक है अल्प-शक्ति -युत इक है, सर्व शक्ति -आधार।
8बनि द्वैती “कृपालु” अब ऊधो!, भजिय ब्रह्म साकार॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजदेवियाँ ज्ञानाभिमानी उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! तुम अपना अद्वैत विचार छोड़ दो। जीव एवं ब्रह्म यह दो तत्व मान लो। जो सृष्टि करता है, सृष्टि की रक्षा करता है एवं प्रलय करता है, बेद के सिद्धान्तानुसार वही ब्रह्म है। जीव ब्रह्म का भेद वेदों के अनुसार कितना बताया गया है, ध्यान हि सुनो। जीव व्याप्त है (क्योंकि जीव में ब्रह्म व्यापक है) ब्रह्म सर्वव्यापक है। जीव दास है, ब्रह्म स्वामी है (क्योंकि सेवक सेव्य भाव के बिना ब्रह्म की प्राप्ति ही असम्भव है)। जीव अंश है (क्योंकि ब्रह्म के अनेक गुणों से युक्त है, ब्रह्म अंशी है। जीव पुत्र है, ब्रह्म पिता है, वेद कहता है (अमृतस्य वै पुत्राः)। जीव प्रेर्य है (क्योंकि कर्म फल भोगवाने में ईश्वर प्रेरक है) ब्रह्म प्रेरक है। जीव सूक्ष्म है, ब्रह्म व्यापक है। जीव अनेक हैं, ब्रह्म एक ही है जिनको तुम अपना सखा मानते हो। जीव अल्प शक्तिमान है, ब्रह्म सर्वशक्तिमान है। 'कृपालु' कहते हैं कि उद्धव! अब अनेकानेक प्रमाणों से तुम्हारे अद्वैत मत का खण्डन हो गया अतएव तुम द्वैती बन कर सेव्य सेवक भाव में आकर सगुण साकार ब्रह्म श्यामसुन्दर की उपासना करो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 739-740