विरह-माधुरी · पद 40
ऊधो!, तुम अज्ञान निधान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, tuma agyāna nidhāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, तुम अज्ञान निधान।
2हम श्रुति-ऋचन ज्ञान समुझावत, जिनते प्रकटत ज्ञान।
3ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान काको कह, काको मानत आन।
4तुम ज्ञानी, हम सब अज्ञानी, यह कैसे रह भान।
5ब्रजरस लता-पता बनि याचत, सनकादिक तजि ध्यान।
6ज्ञान “कृपालु” उनहिं समुझावहु, जिनकी कुब्जा प्रान॥
हिन्दी भावार्थ
(वेद की ऋचाओं की अवतार, श्रीकृष्ण-विरहिणी ब्रज गोपिकाएँ उद्धव से कहती हैं।) हे उद्धव! तुम अत्यन्त ही अज्ञानी हो। हम सब वेद की ऋचाओं को अवतार स्वरूपा गोपियों को तुम ज्ञान समझाने आये हो। तुम इतना भी नहीं जानते कि ज्ञान का प्रादुर्भाव हमारे द्वारा ही है। यह तो बताओ कि ज्ञाता (जानने वाला), ज्ञेय (जानने योग्य) एवं ज्ञान किसको कहते हैं। तात्पर्य यह है कि ब्रह्म को जानने वाला भी ब्रह्म है, एवं जिसको जानना है वह भी ब्रह्म है एवं जिस ज्ञान के द्वारा जानना है वह भी ब्रह्म है। हे उद्धव! तुम सर्वत्र ब्रह्म को देखने वाले हो, फिर तुमको ये कैसे भान रहा कि हम सब आज्ञानी हैं। तुम नहीं जानते कि बड़े-बड़े ज्ञानियों के दादा नित्य-जीवनमुक्त परमहँस सनकादिक भी लता-पता बनकर एवं अपनी निर्विकल्प समाधि को भुलाकर ब्रज की धूलि चाहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हे उद्धव जी! यह ज्ञान तो उन्हीं के लिए समझाना परम आवश्यक है जिनकी प्राणाधिक-प्रिय कुब्जा है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 740-741