# ऊधो!, तुम अज्ञान निधान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0791-M19-K040
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 40
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 371–371

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, तुम अज्ञान निधान।  
<a id="line-2"></a>हम श्रुति-ऋचन ज्ञान समुझावत, जिनते प्रकटत ज्ञान।  
<a id="line-3"></a>ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान काको कह, काको मानत आन।  
<a id="line-4"></a>तुम ज्ञानी, हम सब अज्ञानी, यह कैसे रह भान।  
<a id="line-5"></a>ब्रजरस लता-पता बनि याचत, सनकादिक तजि ध्यान।  
<a id="line-6"></a>ज्ञान “कृपालु” उनहिं समुझावहु, जिनकी कुब्जा प्रान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(वेद की ऋचाओं की अवतार, श्रीकृष्ण-विरहिणी ब्रज गोपिकाएँ उद्धव से कहती हैं।) हे उद्धव! तुम अत्यन्त ही अज्ञानी हो। हम सब वेद की ऋचाओं को अवतार स्वरूपा गोपियों को तुम ज्ञान समझाने आये हो। तुम इतना भी नहीं जानते कि ज्ञान का प्रादुर्भाव हमारे द्वारा ही है। यह तो बताओ कि ज्ञाता (जानने वाला), ज्ञेय (जानने योग्य) एवं ज्ञान किसको कहते हैं। तात्पर्य यह है कि ब्रह्म को जानने वाला भी ब्रह्म है, एवं जिसको जानना है वह भी ब्रह्म है एवं जिस ज्ञान के द्वारा जानना है वह भी ब्रह्म है। हे उद्धव! तुम सर्वत्र ब्रह्म को देखने वाले हो, फिर तुमको ये कैसे भान रहा कि हम सब आज्ञानी हैं। तुम नहीं जानते कि बड़े-बड़े ज्ञानियों के दादा नित्य-जीवनमुक्त परमहँस सनकादिक भी लता-पता बनकर एवं अपनी निर्विकल्प समाधि को भुलाकर ब्रज की धूलि चाहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हे उद्धव जी! यह ज्ञान तो उन्हीं के लिए समझाना परम आवश्यक है जिनकी प्राणाधिक-प्रिय कुब्जा है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 740-741

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
